बस्ती: निजी अस्पतालों की लापरवाही से जच्चा-बच्चा की मौत, सिस्टम बना मूकदर्शक
कागजी डिग्री के सहारे चल रहे अस्पताल, जांच के नाम पर हो रही खानापूर्ति; अप्रशिक्षित हाथों में मरीजों की जान, रसूख के दबाव में दब रहे मामले
अजीत मिश्रा (खोजी)
बस्ती में निजी अस्पतालों की लापरवाही: इलाज के नाम पर हो रही जानलेवा अनदेखी
- आए दिन मरीज गंवा रहे जान, जांच में उलझकर रह जाती है कार्रवाई
- निजी अस्पतालों में दो माह में सात से अधिक मौतों के बाद भी प्रशासन मौन
बस्ती के निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान होने वाली मौतों का सिलसिला लगातार जारी है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।बस्ती के निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर चल रहा ‘मौत का खेल’ अब किसी से छिपा नहीं है। पिछले दो महीनों में सात से अधिक जानें चली गई हैं, लेकिन सिस्टम है कि वह सिर्फ फाइलों की धूल झाड़ने में व्यस्त है। क्या एक सामान्य नागरिक की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई है कि अस्पताल अपनी मनमानी करते रहें और प्रशासन केवल ‘खानापूर्ति’ की रस्म अदा करता रहे?
कागजी कार्रवाई का अंतहीन सिलसिला
अस्पतालों में होने वाली मौतों के बाद जांच के नाम पर जो प्रक्रिया शुरू होती है, वह अक्सर किसी अंजाम तक नहीं पहुंचती। एक तरफ वाल्टरगंज की गर्भवती महिला और उसके बच्चे की मौत जैसी हृदयविदारक घटनाएं होती हैं, तो दूसरी तरफ रसूखदार लोगों के दबाव में आकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। जब जांच ही ‘दबाव’ और ‘सहमति’ की भेंट चढ़ जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?
हालिया हृदयविदारक घटना
हाल ही में, वाल्टरगंज थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत पलटनपुर निवासी प्रतिभा चौधरी (24) की मृत्यु ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।
- प्रतिभा को शनिवार को स्टेशन रोड स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
- चिकित्सकों ने ऑपरेशन की सलाह दी, लेकिन रविवार भोर में ऑपरेशन से पहले बेहोशी का इंजेक्शन लगते ही महिला की हालत बिगड़ गई।
- परिजन का आरोप है कि वहां मौजूद चिकित्सक स्थिति संभालने में विफल रहे और अप्रशिक्षित हाथों द्वारा बेहोशी की ओवरडोज देने के कारण जच्चा और बच्चा दोनों की मौत हो गई।
प्रशासनिक उदासीनता और कागजी खानापूर्ति
पिछले दो महीनों में निजी अस्पतालों में सात से अधिक मरीजों की जान जा चुकी है, लेकिन जिम्मेदार प्रशासन केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित है।
- मामलों को ठंडे बस्ते में डालने के लिए विभागीय स्तर पर खानापूर्ति की जाती है।
- अक्सर जन प्रतिनिधियों के दबाव में आकर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाने की कोशिश की जाती है, जिससे दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती।
डॉक्टर कोई और, लाइसेंस किसी और का
सबसे भयावह पहलू यह है कि कई अस्पताल बिना योग्य डॉक्टरों के, महज कागजी डिग्री के सहारे चल रहे हैं। अमृत अस्पताल का उदाहरण हमारे सामने है, जहां जिस डॉक्टर की डिग्री पर पंजीकरण था, वे वहां मौजूद ही नहीं थे। बिना प्रशिक्षित स्टाफ के आपरेशन और बेहोशी की ओवरडोज देना, इलाज नहीं, बल्कि सीधे तौर पर हत्या है। क्या यह स्वास्थ्य विभाग की विफलता नहीं है कि उसे यह पता ही नहीं कि अस्पताल कौन चला रहा है?
जांच में कई गंभीर अनियमिताएं सामने आ रही हैं:
- डिग्री का दुरुपयोग: अमृत अस्पताल के मामले में पता चला कि जिस डॉक्टर की डिग्री पर पंजीकरण है, वे घटना के समय वहां मौजूद ही नहीं थे।
- अकुशल स्टाफ: जिले में कई ऐसे अस्पताल हैं जहां पंजीकृत सर्जन के बजाय अन्य लोग ऑपरेशन करते हैं और बेहोशी का डोज भी अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा दिया जाता है।
- बड़े पैमाने पर अवैध क्लिनिक: जिले में लगभग 120 निजी अस्पताल और 40 क्लिनिक पंजीकृत हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि इनसे दोगुने अस्पताल अवैध रूप से संचालित हो रहे हैं।
क्या केवल ‘सीलिंग’ ही समाधान है?
हर बार हंगामे के बाद स्वास्थ्य विभाग एक टीम गठित करता है, अस्पताल के एक हिस्से को सील करता है और नोटिस जारी कर देता है। यह कार्रवाई उस शोर को शांत करने का एक छोटा सा प्रयास मात्र है, जो कुछ समय बाद फिर से उसी ढर्रे पर लौट आता है। जिले में 120 पंजीकृत अस्पतालों के समानांतर, उससे दोगुने अवैध क्लीनिक संचालित हो रहे हैं। यह आंकड़े प्रशासन की उदासीनता की पोल खोलने के लिए पर्याप्त हैं।
स्वास्थ्य विभाग का पक्ष
सीएमओ बस्ती, डॉ. राजीव निगम का कहना है कि जच्चा-बच्चा मौत प्रकरण में नोडल अधिकारी को जांच के लिए कहा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जांच में यह देखा जाएगा कि क्या पंजीकृत चिकित्सक ने ही ऑपरेशन किया था और बेहोशी की दवा का डोज किसने दिया था, जिसके बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
निष्कर्ष
जब तक ‘रसूख’ और ‘दबाव’ स्वास्थ्य सेवाओं पर हावी रहेंगे, तब तक बस्तियां ऐसे ही उजड़ती रहेंगी। केवल टीम गठित करने से काम नहीं चलेगा; जरूरत है कठोर दंडात्मक कार्रवाई की, ताकि कोई भी निजी अस्पताल मरीज की जान को खिलौना समझने की जुर्रत न करे।
सवाल अब यह है: क्या सिस्टम अपनी नींद से जागेगा, या अगली बलि का इंतजार करेगा?












